Netaji Subhash Chandra Bose Biography Hindi: Birthday, Education, Family, Death

नाम (Name)नेताजी सुभाष चंद्र बोस (Netaji Subhash Chandra Bose)
हाइट (Height)5’9″ (179 सेमी)
पेशा (Profession)राजनेता, सेना कमांडर, सिविल सेवा अधिकारी और स्वतंत्रता सेनानी (Politician, Military Commander, Civil Service Officer and Freedom Fighter)
जन्मतिथि/ जयंती (Birthday/ Jayanti)23 जनवरी, 1897 (23 January, 1897)
जन्मस्थान (Place of Birth)कटक, ओडिशा, भारत ( Cuttack, Odisha, India)
मृत्यु की तिथि (Date of Death)18 अगस्त, 1948 (जापानी न्यूज़ एजेंसी के अनुसार
उम्र (मृत्यु के वक्त) (Age: at the time of death)48 वर्ष (48 years)
मृत्यु का कारण (Cause of Death)स्पष्ट नहीं; (संभवतः ताइवान के ताइपेई में उनका प्लेन क्रैश हो गया था।) (Plane crashed in Taipei, Taiwan)
पिता (Father)जानकीनाथ बोस (Jankinath Bose)
माता (Mother)प्रभावती देवी (Prabhavati Devi)
विवाह वर्ष (Marriage Year)1937
पत्नी (Wife)एमिली शेनल (Emilie Schenkl)
सन्तान (Child)पुत्री (Daughter): अनिता बोस फाफ (Anita Bose Pfaff)
स्कूल (School)Ravenshaw Collegiate School, Cuttack, Odisha, India
कॉलेज (College)Presidency College, Scottish Church College, Fitzwilliam College
शिक्षा (Education)बैचलर ऑफ आर्ट्स (Bachelor of Arts)
जाति (Caste)कायस्थ (Kayastha)
राशि (Zodiac Sign)मीन (Aquarius)
धर्म (Religion)हिन्दू (Hinduism)
राष्ट्रीयता (Nationality)   भारतीय (Indian)
राजनीतिक मत (Political Ideology)राष्ट्रवाद, कम्युनिज्म, फासिज़्म की तरफ झुकाव (Nationalism, Communism, Fasism-inclined)
संगठन/ राजनीतिक पार्टी (Political Party)Indian National Army
1921-1939: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC)
1939-1940: All India Forward Block (AIFB)
राजनीतिक सफर (Political Journey)All India National Congress के अध्यक्ष (1923)
• बंगाल स्टेट कांग्रेस के सचिव(1923)
• कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी (1927)
• कलकत्ता के मेयर (1930)
महत्वपूर्ण कथन (Famous Slogans)‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा”
‘जय हिंद’
‘दिल्ली चलो’
‘इत्तेेफाक, एत्माद, कुुर्बानी’

Neta ji Subhash Chandra Bose Quotes:

Neta ji Subhash Chandra Bose quotes
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Some Interesting Facts about Neta ji Subhash Chandra Bose

●1916 में अपने कॉलेज के दिनों में सुभाषचंद्र बोस (Neta ji Subhash Chandra Bose) ने प्रेसिडेंसी कॉलेज के एक प्रोफेसर ई. एफ. ओटेन को काफी बुरी तरह मारा था। इसकी वजह ये थी कि उस प्रोफेसर ने सुभाषचंद्र बोस के साथ पढ़ने वाले साथी पर एक अभद्र नस्लीय टिप्पणी कर दी थी, जिसकी वजह से सुभाषचंद्र को फिर प्रेसिडेंसी कॉलेज और कलकत्ता यूनिवर्सिटी में पढ़ने से प्रतिबन्धित कर दिया गया।

●ब्रिटिश सरकार सुभाषचंद्र के खिलाफ अरेस्ट वारेंट जारी किया गया था, तब 16 जनवरी 1941, को सुभाषचंद्र बोस अपने भाई शिशिरकुमार बोस के साथ एल्गिन रोड पर स्थित अपने घर से ब्रिटिश अधिकारियों को चकमा देकर भाग निकले। वे जर्मनी जाने के लिए अफ़ग़ानिस्तान और सोवियत यूनियन होकर जा रहे थे। इसके लिए उन्होने एक पठान का छद्म वेश बनाया था, और भागने के लिए उन्होंने जर्मनी में बनी Wanderer W24 Sedan car (Reg. No. BLA 7169) का इस्तेमाल किया था, जो अब उनके एल्गिन रोड वाले घर पर उनकी धरोहर के रूप में सहेज कर रखी गई है।

मेजर जनरल जी. डी. बक्शी ने अपनी पुस्तक “Bose: The Indian Samurai – Netaji and the INA Military Assessment,” में लिखा है कि बोस की मृत्यु प्लेन क्रैश होंने की वजह से नही हुई थी, बल्कि वे जापान से निकलकर सोवियत यूनियन आ गए थे, जहां बाद में ब्रिटिश और सोवियत यूनियन के अधिकारियों के बीच मे किसी समझौते के अंतर्गत वहां की सरकार ने सुभाषचन्द्र बोस को ब्रिटिशर्स के हाथों सौंप दिया। और फिर ब्रिटिश अधिकारियों ने उनसे सवाल करने के बहाने से उन्हें इतना ज्यादा प्रताड़ित किया कि उनकी मृत्यु हो गई। 

Neta ji Subhash Chandra Bose’s life:

सुभाषचन्द्र बोस एक ऐसे भारतीय राजनेता थे, जिनके देशप्रेम और कुर्बानी ने करोड़ों भारतीयों के मन मे उनके प्रति असीम श्रद्धा जगा दी है। उन्हें मुख्य तौर पर ‘आज़ाद हिंद फ़ौज’ (Azad Hind Fauj) के गठन और उनके महत्वपूर्ण नारे ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा’ के लिए जाना जाता है। 

वैसे तो नेताजी की मौत को लेकर कारण स्पष्ट नहीं हुए थे, लेकिन ऐसा माना जाता है कि 18 अगस्त, 1944 को ताइवान के ताइपेई शहर में प्लेन क्रैश होने की वजह से उनकी मृत्यु हुई थी। पर हमारे देश मे अभी भी बहुत-से लोग इस पर यकीन नहीं करते। 

सुभाषचंद्र बोस को भारत का सबसे प्रभावशाली स्वतंत्रता सेनानी माना जाता है। उनकी नेतृत्व की क्षमता और वक्तव्य कला बेमिसाल थी। ‘जय हिन्द’, ‘दिल्ली चलो’, ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा’ उनके महत्वपूर्ण नारे थे। उन्होंने भारत की आज़ादी के संग्राम में और भी बहुत-से योगदान दिए। सुभाषचंद्र बोस को आजादी के संघर्ष में सैन्य दृष्टिकोण और उनकी समाजवादी नीतियों के लिए याद किया जाता है।

Neta ji Subhash Chandra Bose: Family and Education

Neta ji Subhash Chandra Bose का जन्म 23 जनवरी, 1897 को उड़ीसा के कटक शहर में हुआ था। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माता का नाम प्रभावती देवी था। उनके पिता पेशे से एक कामयाब वकील थे, जिन्हें वहां के लोग सम्मान के तौर पर ‘राय बहादुर’ कहते थे। उन्होंने अपनी शिक्षा बाकी भाई-बहनों की तरह ही कटक के प्रोटेस्टेंट हाई स्कूल से प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने वहां के प्रेसिडेंसी कॉलेज से कला में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। 16 वर्ष की उम्र में स्वामी विवेकानंद और उनके गुरू रामकृष्ण परमहंस के विचारों से वे काफी ज्यादा प्रभावित हुए। इसके बाद उनके माता-पिता द्वारा उन्हें आगे की पढ़ाई और सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करने के लिए इंग्लैंड की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी भेज दिया गया। वर्ष 1920 में, नेताजी सुभाष चंद्र बोस सिविल सेवा की परीक्षा में सफल भी हो गए। लेकिन 1921, में ही उन्होंने भारत मे राष्ट्रवाद आंदोलन के प्रति समर्थन दिखाते हुए, अपने पद से इस्तीफा दे दिया और वापस भारत आ गए। 

Neta ji Subhash Chandra Bose & Mahatma Gandhi

इसके बाद वे महात्मा गांधी द्वारा संचालित ‘असहयोग आंदोलन’ (Non-Cooperation Movement) से जुड़ गए। इस आंदोलन के कारण ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) एक मजबूत अहिंसावादी संगठन के रूप में स्थापित हो गई। इस आंदोलन के दौरान, महात्मा गांधी ने उन्हें चितरंजन दास के साथ मिलकर काम करने का आग्रह किया। चितरंजन दास आगे चलकर नेताजी के राजनीतिक गुरु भी बने। इस सबके बाद, नेताजी बंगाल स्टेट कांग्रेस के युवा शिक्षक और कमांडर भी बन गए। 

नेताजी ने ‘स्वराज’ (Swaraj) नाम का एक समाचार पत्र भी शुरू किया। अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों के चलते वे कुछ वक्त के लिए जेल भी गए। 1927 में, जेल से रिहा होने के बाद बोस कांग्रेस पार्टी के जनरल सेक्रेटरी बन गए और उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के साथ मिलकर भारत की आजादी के लिए कार्य भी किया। 

1938 में उनका चयन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में किया गया, जिसके बाद उन्होंने बड़े स्तर पर औद्योगिकीकरण के लिए राष्ट्रीय योजना कमिटी का गठन भी किया। हालांकि, गांधी जी नेताजी का यह कदम, कुछ खास पसंद नहीं आया, क्योंकि इससे कुटीर उद्योग और राष्ट्र में खुद के संसाधन से विकास का ज़िक्र नहीं था। 

1939 में पार्टी में बोस की लोकप्रियता इतनी बढ़ चुकी थी, कि गांधी के समर्थन प्राप्त एक प्रतिद्वंद्वी को चुनाव में हराकर, बोस एक बार फिर पार्टी अध्यक्ष चुने गए थे। हालांकि, बाद में, गांधी द्वारा उचित समर्थन न दिए जाने पर बोस ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और साथ ही उन्होंने कांग्रेस पार्टी की अपनी सदस्यता भी त्याग दी। 

Neta ji Subhash Chandra Bose & his party Forward Bloc

All India Forward Bloc एक लेफ्ट विंग की राष्ट्रवादी राजनीतिक पार्टी थी, जो 1939 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) से टूटकर बनी थी। इस पार्टी की स्थापना स्वयं नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने की थी। उन्हें पहले भी कांग्रेस में अपने लेफ्टिस्ट विचारों के लिए जाना जाता था। Forward Bloc का सबसे मुख्य उद्देश्य कांग्रेस पार्टी के सभी उग्र लोगों को एक साथ लाना था, ताकि वे भारत की सम्पूर्ण स्वतंत्रता की बात को सब जगह फैला सकें, जिसमे समानता और सामाजिक न्याय जैसे सबसे महत्वपूर्ण तत्व भी शामिल थे। 

Subhas Chandra Bose and Azad Hind Fauz aka INA

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक नई कड़ी के रूप में सुभाषचंद्र बोस द्वारा बनाई गई ‘आज़ाद हिंद फौज’ (Indian National Army) जुड़ गई, जिसे INA के नाम से भी जाना जाता था। रास बिहारी बोस, एक भारतीय क्रांतिकारी थे, जो जापान में रहकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभा रहे थे, इसके लिए उन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में रह रहे भारतीयों  के साथ मिलकर भारतीय स्वतन्त्रता लीग की भी स्थापना की थी। 

जब जापान ने ब्रिटिश सेना को हराया और उसके द्वारा अधिकार किये गए लगभग हर एक दक्षिण- पूर्व एशियाई देश को मुक्त कराया, तब इसी लीग ने भारत को ब्रिटिश राज से आजादी दिलाने के उद्देश्य से स्वयं को भारतीय युद्ध बंदियों की मदद से Indian National Army के रूप में स्थापित किया। ब्रिटिश इंडियन आर्मी में अधिकारी रहे, जनरल मोहन सिंह ने इस आर्मी को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 

उसी दौरान 1941 में, सुभाषचंद्र बोस भी ब्रिटिश सेना को चकमा देकर भारत से सुरक्षित बाहर निकल आए और जर्मनी जाकर भारत की आज़ादी के लिए रणनीति बनाने में लग गए। 1943 में, वे सिंगापुर इंडियन इंडिपेंडेंस लीग का नेतृत्व करने आए और उन्होंने उसे यहां आज़ाद हिन्द फौज (Azad Hind Fauz) का रूप दिया, ताकि ये बेहतर रणनीति के साथ भारतीय स्वतंत्रता के लिए कार्य कर सके। आज़ाद हिंद फौज में 45,000 से भी अधिक सैनिक शामिल थे, जिनमे से कुछ भारतीय युद्धबंदी और अन्य सभी दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में रहने वाले भारतीय नागरिक थे। 

21 अक्टूबर, 1943 की सुभाषचंद्र बोस, जिन्हें लोग प्यार से ‘नेताजी’ भी कहते थे, ने सिंगापुर में स्वतंत्र भारत (Azad Hind) की प्रावधानिक सरकार (Provisional Government) के गठन की घोषणा कर दी। नेताजी अंडमान गए, जिस पर जापान द्वारा अधिकार किया गया था, और वहां जाकर उन्होंने भारतीय झण्डे का ध्वजारोहण किया। 1944 के आरंभ में भारत के उत्तर-पूर्वी भाग से ब्रिटिश को भगाने के लिए आज़ाद हिन्द फौज की तीन टुकड़ियों ने उन पर हमला भी किया था। आज़ाद हिन्द फौज के प्रमुख अफसर शाह नवाज़ खान के अनुसार, सेना के सभी सैनिकों ने भारत की ज़मीं पर कदम रखते ही झुककर अपनी मातृभूमि को नमन किया और उसकी मिट्टी को चूमा। हालांकि, उनका यह प्रयास भारत को आज़ादी दिलाने में कामयाब नही हो सका। 

भारत के राष्ट्रवादी आन्दोलन के सूत्रधार उस वक्त जापान को अपना मित्र स्वीकार नही कर सके थे। जापान ने जिस देशों पर अधिकार किया था, उनकी संवेदनाएं वहां के निवासियों के प्रति थीं। हालांकि नेताजी के मानना था कि जापान द्वारा सहायताप्राप्त, आज़ाद हिंद फौज और भारत के अंदर उपजे एक विद्रोह के दम पर भारत के अंदर ब्रिटिश शासन के तख्त को उखाड़ कर फेंका जा सकता था। भारत के अंदर और बाहर के निवासियों के लिए, आज़ाद हिंद फौज का नारा ‘दिल्ली चलो’ और ‘जय हिंद’ देशभक्ति की भावनाओं को जगाने के लिए काफी था। नेताजी सभी दक्षिण-पूर्व एशियाई भारतीय लोगों को एक साथ लाकर भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में योगदान देने के लिए संगठित कर चुके थे।

भारत की आज़ादी की इस लड़ाई में सिर्फ पुरुषों ने, बल्कि महिलाओं ने भी बढ़चढ़कर भाग लिया था। आज़ाद हिंद फौज में एक महिला रेजीमेंट का गठन भी किया गया था, जिसका नेतृत्व कर रहीं थी कैप्टन लक्ष्मी स्वामीनाथन (Captain Lakshmi Swaminathan) और महिलाओं की इस रेजिमेंट का नाम रखा गया था भारत की वीरांगना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के नाम पर। 

Subhash Chandra Bose Death

दुर्भाग्यवश, दूसरे विश्व युद्ध मे जापान के आत्मसमर्पण के बाद, एयरप्लेन क्रैश की एक संदिग्ध दुर्घटना में भारत के सबसे महान स्वतंत्रता सेनानियों में से एक, नेताजी सुभाषचंद्र बोस के निधन हो गया, जो कि पूरे देश के लिए बहुत बड़ी क्षति थी। 

1945 में फासीवादी ताकतों जर्मनी और इटली की हार के साथ ही द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो गया। करोड़ों लोगों की इस युद्ध मे जान गई। जब ये युद्ध अपने अंत की ओर था और जर्मनी और इटली जैसी प्रमुख ताकतें हार चुकी थीं, टैब अमेरिका ने जापान के दो प्रमुख शहरों- हिरोशिमा (Hiroshima) और नागासाकी (Nagasaki) पर एटम बम गिरा दिए। कुछ ही पलों में ये दोनों शहर तबाह हो चुके थे, करीब चंद मिनटों में ही 2 लाख से भी ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके थे। अमेरिका के इस हमले के बाद जापान को घुटने टेकने पर मजबूर होना पड़ा। भले ही द्वितीय विश्व युद्ध का अंत एटम बम (atom bomb) जैसे विनाशकारी हथियार के दम पर किया गया हो, लेकिन, उसके बाद से ही दुनिया मे नए, आधुनिक और घातक हथियारों को बनाने ही होड़ मच गई और जिसने दुनिया को आग के एक ढेर पर लाकर रख दिया है।

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