Racism/ Colorism in India: “भारत मे रंगभेद” पर हिंदी निबंध

Racism of West = Colorism of India: Analysis of Indian Racism

25 मई 2020. इस दिन भी ये दुनिया, इस साल के बाकी दिनों की तरह ही Covid- 19 नाम के वायरस से लड़ रही थी, लेकिन तभी अमेरिका के मिनेसोटा में, जॉर्ज फ्लॉयड नाम के एक शख्स को एक दूसरे वायरस की वजह से अपनी जान गंवानी पड़ी। ये दूसरा वायरस Racism, अमेरिका के समाज में सदियों से फैला हुआ है और यकीन मानिए George Floyd इसका पहला शिकार नही हैं, और न ही आखिरी. 

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श्वेत और अश्वेत की ये लड़ाई यानी Racism जब अमेरिका से भारत की तरफ आती है, तो वो खुद को यहां के माहौल से हिसाब से Colorism में बदल लेती है। अलग अलग नस्लों की ये लड़ाई, भारत आकर रंगत की लड़ाई बन जाती है. भारत में रंगत को खूबसूरती से जोड़कर देखना कोई नई बात नही है। हमारे समाज में और लोगों की सोच में, इसकी जड़ें काफी अंदर तक समाई हुई हैं। शायद यही वजह है कि भारत में किसी व्यक्ति को उसकी त्वचा के रंग के आधार पर, उसे खूबसूरत या बदसूरत का टैग दे दिया जाता है।  

गोरे और काले की इस लड़ाई में हमने कभी इस भेदभाव को खत्म करने की तरफ ध्यान ही नहीं दिया. बल्कि हमारा ध्यान, तो हमेशा इस तरफ रहा कि कैसे कालेपन को मिटाकर उसे गोरे रंग में बदला जा सके? अगर आप यह बात नहीं मानते या मानने से इंकार कर रहे हैं तो अपना टीवी ऑन करके देखिए, 10 में से 7 एड आपको फेयरनेस क्रीम्स के दिख जाएंगे. यकीन मानिए, उन एड में प्रयोग की गई क्रिएटिवटी देखकर आपका मन भर आएगा. उनमें दिखाया जाता है कि कैसे आपको अच्छी पत्नी, अच्छी बहू बनने के लिए फेयरनेस क्रीम लगानी चाहिए? कैसे आपको अच्छी नौकरी पाने के लिए फेयरनेस क्रीम लगानी पड़ेगी? आप जीवन में कहीं भी पहुंच जाएं, लेकिन कामयाब आप तभी होंगे, जब आप सुन्दर दिखेंगे और सुंदर आप तब ही दिखेंगे, जब आप इस कम्पनी की फेयरनेस क्रीम लगाकर अपनी चमड़ी गोरी कर लेंगे।

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ये भेदभाव मानने से हम इंकार कर सकते हैं, लेकिन ये बात बिल्कुल सच है कि हम इससे जूझ रहे हैं और किसी न किसी तरह इसे बढ़ा ही रहे हैं. गोरा या काला होना, भारत की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है और ये समस्या तब और भी बड़ी हो जाती है जब ये दूसरी कुप्रथाओं के साथ मिल जाती है. जैसे कि दहेज, भारत में दहेज प्रथा भी कम खतरनाक नही है। जैसे कोई लड़की अगर यहां गहरी रंगत की पैदा होती है, तो उसके माता- पिता को उसकी शादी के दहेज की चिंता सताने लगती है। वो जानते हैं कि उनकी बच्ची समाज की नजर में खूबसूरत नही है और शादी करने के लिए उन्हें सामान्य से दुगना दहेज उसके ससुराल पक्ष को देना पड़ेगा. दहेज बुरा है और यह ऐसी परिस्थिति में और भी बुरा हो जाता है. 

खैर अब भी आप यही कहेंगे कि दहेज तो पुरानी बात हो गई, लेकिन हमारी बॉलीवुड इंडस्ट्री तो नई जगह है, नए विचारों और खुली सोच वाली, पढ़े लिखे और हुनरमंद लोगों की जगह. लेकिन अफ़सोस कि वहाँ भी आप काले या साँवले एक्टर्स को उंगलियों पर गिन सकते हैं. और काली रंगत की एक्ट्रेस तो आपको ना के बराबर ही दिखेंगी। और अगर दिख भी गई, तो वो या तो किसी कॉमिक रोल के लिए वहाँ पर मौजूद होगी या फिर किसी साइड रोल के लिए. हमारी फिल्में तक यह मानने को तैयार नहीं होतीं कि काले रंग के भी लोग होते हैं. फिल्मों का तो ये हाल है कि किसी काले रंग के किरदार को निभाने के लिए भी, किसी गोरे एक्टर के चेहरे पर ही कालिख लगाई जाएगी. लेकिन उस किरदार के लिए किसी गहरी रंग के व्यक्ति को मौका देना उन्हें गंवारा नहीं। क्योंकि यही तो मानता है हमारा समाज उन्हें. कालिख. 

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अगर समस्या है तो समस्या का हल भी होगा. इस समस्या का भी है. इसका सीधा सा हल ये है कि काले को काला और गोरे को गोरा मानना बंद कर दीजिए. वो उसके आगे भी एक पर्सनैलिटी हैं, उसमें टैलेंट हैं या बुरी भावनाएं भी हैं या कुछ अच्छे ख्याल भी हैं. उन इंसानों को उनकी पर्सनैलिटी के हिसाब से ट्रीट करिए, ना कि वो काले हैं या गोरे. ये एक दिन में नहीं होने वाला, इसके लिए हमारी आने वाली पीढ़ियों के मन से ये भेद मिटाना होगा। ज़ाहिर है इसमे वक्त लगेगा, ये बदलाव धीरे धीरे ही होगा, आपसे और मुझसे ही होगा.

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